← Back to VOLUME 13, ISSUE 7, JULY 2026
This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.
अनर्घराघवम् नामक नाट्य-कृति में वर्णित रामायणकालीन संस्कृति का दार्शनिक अनुशीलन
डॉ. कीर्ति कुमार त्रिपाठी, कीर्ति तिवारी
👁 6 views📥 0 downloads
सारांश: नाटक को काव्य का सर्वाधिक रमणीय रूप माना गया है, जैसा कि प्रसिद्ध उक्ति है। ’नाट्यशास्त्र’ के प्रवर्तक भरतमुनि ने ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के लगभग रचित अपने महान ग्रंथ ’नाट्यशास्त्र’ के 36 अध्यायों में नाट्य सिद्धांत का सर्वप्रथम प्रामाणिक एवं व्यापक विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने घोषणा की कि संसार में ऐसा कोई ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग या कर्म नहीं है जो नाटक में प्रतिबिंबित न होता हो। नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय के श्लोक में भरतमुनि नाटक के महत्व का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं कि यह केवल धर्म और देवताओं की चर्चा नहीं करता, बल्कि संसार के समस्त भावों और अनुभवों का चित्रण करता है। इसमें धर्म, मनोरंजन, हास्य, युद्ध, श्रम, प्रेम तथा जीवन के प्रत्येक पक्ष का वर्णन है। नाटक धनवानों के लिए मनोरंजन, दुःखियों के लिए सांत्वना, पेशेवरों के लिए आजीविका का साधन तथा व्याकुल लोगों के लिए शांति का स्रोत है। मुरारि के नाटक अनर्घराघवम् का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विश्लेषण पूर्ण करने के लिए नैतिक मूल्य, व्यावहारिक आचरण, चातुर्वर्ण व्यवस्था, चतुराश्रम व्यवस्था तथा पुरुषार्थ चतुष्टय को सम्मिलित करके कहा जाता है। यह विविध अध्ययन क्षेत्रों में एक मूल्यवान स्रोत सिद्ध होगा। इस शीर्षक के अंतर्गत किया गया। महर्षि वाल्मीकि की ’रामायण’ और मुरारि के अनर्घराघवम् में भगवान श्रीराम के चरित्र-चित्रण के अंतर को भी उद्घाटित करेगा, जिससे साहित्य और समाज को नई चेतना प्राप्त होगी। यह भी स्पष्ट करेगा कि सहस्रार्जुन का वध भगवान के किस हाथ द्वारा नियत थाकृएक ऐसा बिंदु जिसे अब तक स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया है। जब भगवान श्रीराम परशुराम से संवाद करते हैं, तब वे अत्यंत विनम्रता के साथ दृढ़ता व्यक्त करते हुए सूक्ष्म रूप से अपने पराक्रम का संकेत देते हैं, जिससे साहित्यिक अनुसंधान का एक नया क्षेत्र उद्घाटित होता है। मुरारि ने नाटकीय भाषा में उन पक्षों को अत्यंत कुशलता से प्रस्तुत किया है, जिनका उल्लेख ’वाल्मीकि रामायण’ में तो है, किंतु मानव समाज के कल्याण के लिए उन्हें स्पष्ट रूप से जनसामान्य के समक्ष नहीं लाया गया था।
मुख्य शब्द: मानव, नैतिक, शिखरस्थ, अन्वेषण, जीवन मूल्य आदि।
How to Cite:
[1] डॉ. कीर्ति कुमार त्रिपाठी, कीर्ति तिवारी, “अनर्घराघवम् नामक नाट्य-कृति में वर्णित रामायणकालीन संस्कृति का दार्शनिक अनुशीलन,” International Advanced Research Journal in Science, Engineering and Technology (IARJSET), DOI: 10.17148/IARJSET.2026.13736
